ईरान में विरोध प्रदर्शनों को कुचलने के लिए फांसी का सहारा क्यों ले रही है सरकार

ईरान में विरोध प्रदर्शनों को कुचलने के लिए फांसी का सहारा क्यों ले रही है सरकार

ईरान की राजधानी तेहरान और उसके आस-पास के इलाकों में तनाव एक बार फिर चरम पर है। सरकार विरोधी आवाजों को दबाने के लिए ईरान की न्यायपालिका ने कड़ा रुख अपनाया है। हाल ही में ईरान की न्यायिक समाचार एजेंसी मिज़ान (Mizan) ने पुष्टि की है कि जनवरी में भड़के देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों में शामिल रहने के आरोप में दो और युवकों को फांसी पर लटका दिया गया है।

अधिकारियों ने इन युवकों पर बेहद गंभीर धाराएं लगाई थीं। सरकार के खिलाफ खड़े होने वाले इन प्रदर्शनकारियों पर न सिर्फ सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने का आरोप था, बल्कि उन पर 'मोहरेबेह' यानी 'भगवान के खिलाफ युद्ध छेड़ने' का मुकदमा चलाया गया। ईरान के कानून में इस आरोप का सीधा मतलब सिर्फ और एक ही है—सजा-ए-मौत।

डर का माहौल बनाने की सोची-समझी रणनीति

ईरान में यह कोई पहली घटना नहीं है। जनवरी 2026 की शुरुआत में जब देश में बेतहाशा बढ़ती महंगाई और खराब आर्थिक नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हुए थे, तो सरकार ने उन्हें रोकने के लिए पूरी ताकत झोंक दी। सुरक्षाबलों की सीधी कार्रवाई में सैकड़ों लोगों की जान चली गई और हजारों को हिरासत में ले लिया गया। लेकिन जब सड़कों पर बल प्रयोग से भी लोग पीछे नहीं हटे, तो न्यायपालिका को आगे कर दिया गया।

न्यायालयों के जरिए इतनी तेजी से मृत्युदंड की सजा दी जा रही है कि आरोपी के परिवार को संभलने का मौका तक नहीं मिल रहा। जनवरी में गिरफ्तार किए गए 26 वर्षीय इरफान सुल्तानी के मामले में भी यही देखने को मिला था। गिरफ्तारी के कुछ ही दिनों के भीतर उनके डेथ वारंट पर मुहर लगा दी गई और परिवार को सिर्फ आखिरी 10 मिनट की मुलाकात की इजाजत मिली।

इस तरह की जल्दबाजी के पीछे ईरान सरकार का एक साफ मकसद नजर आता है। वे आम नागरिकों के मन में इतना खौफ पैदा कर देना चाहते हैं कि कोई दोबारा सड़कों पर उतरने की हिम्मत न कर सके। जब लोगों को यह दिखेगा कि सरकार का विरोध करने का अंजाम सीधे फांसी का फंदा है, तो आंदोलन की आग अपने आप ठंडी पड़ जाएगी। सरकार इसी थ्योरी पर काम कर रही है।

मानवाधिकार संगठनों की चिंता और अदालतों की सच्चाई

एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी वैश्विक मानवाधिकार संस्थाओं ने ईरान की इन अदालती कार्यवाहियों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों का मानना है कि इन युवकों को अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए न तो पर्याप्त समय दिया गया और न ही उनके वकीलों को केस फाइल देखने की अनुमति मिली। कानूनी जानकारों का कहना है कि ज्यादातर मामलों में दबाव और टॉर्चर के दम पर कबूलनामे तैयार किए जाते हैं और फिर उन्हीं को आधार बनाकर सजा सुना दी जाती है।

विदेशी जमीन से काम कर रहे ईरानी मानवाधिकार समूहों के आंकड़े बताते हैं कि सिर्फ जनवरी के दो हफ्तों के भीतर अलग-अलग जेलों में दर्जनों कैदियों को मृत्युदंड दिया गया। सरकार इन मौतों को सामान्य आपराधिक मामलों या ड्रग तस्करी से जोड़कर दिखाती है, लेकिन जमीनी हकीकत पर नजर रखने वालों का दावा है कि इनमें से बड़ी संख्या राजनीतिक कैदियों और प्रदर्शनकारियों की है।

वैश्विक प्रतिक्रिया और आगे का रास्ता

इन लगातार होती फांसियों के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने ईरान की कड़ी निंदा की है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद और कई पश्चिमी देशों ने इन मृत्युदंडों को 'गैर-कानूनी हत्याएं' करार दिया है। हालांकि, ईरान इन वैश्विक दबावों को पूरी तरह खारिज करता आया है। उसका हमेशा से यही रुख रहा है कि देश के आंतरिक मामलों में किसी बाहरी ताकत का दखल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। वह इस पूरे आंदोलन को अमेरिका और इजरायल जैसी ताकतों की साजिश बताता है।

मौजूदा हालात को देखते हुए यह साफ है कि ईरान सरकार अपने कड़े रुख से पीछे हटने वाली नहीं है। आम नागरिकों के लिए वहां स्थितियां लगातार संवेदनशील बनी हुई हैं। अगर आप वैश्विक राजनीति या मानवाधिकारों से जुड़े इन घटनाक्रमों पर नजर रखना चाहते हैं, तो संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (OHCHR) और एमनेस्टी इंटरनेशनल की आधिकारिक रिपोर्टों को सीधे फॉलो करें। वहां आपको जमीनी स्तर पर जुटाए गए प्रामाणिक आंकड़े और कानूनी विश्लेषण नियमित रूप से मिल जाएंगे।

PM

Penelope Martin

An enthusiastic storyteller, Penelope Martin captures the human element behind every headline, giving voice to perspectives often overlooked by mainstream media.