सूडान की राजधानी खार्तूम एक बार फिर धमाकों की गूंज और चीख-पुकार से दहल गई है। हालिया हवाई हमले में 6 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। ये कोई आकस्मिक घटना नहीं बल्कि उस अंतहीन सिलसिले का हिस्सा है जो पिछले कई महीनों से सूडान के आम नागरिकों की जिंदगी को नर्क बना रहा है। जब आप ये खबर पढ़ रहे हैं, तब भी वहां के किसी इलाके में आसमान से मौत बरस रही होगी। यह हमला केवल आंकड़ों का खेल नहीं है। यह एक देश के बिखरते हुए सामाजिक ढांचे और नाकाम कूटनीति की जीती-जागती तस्वीर है।
सूडान की सड़कों पर अब रौनक नहीं, सिर्फ मलबे का ढेर नजर आता है। हवाई हमले से मचा हाहाकार इस बात का प्रमाण है कि युद्धरत गुटों के लिए मानवाधिकारों की कोई कीमत नहीं बची। पिछले कुछ घंटों में जो हुआ, उसने फिर से साबित कर दिया कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय की अपीलें सूडान के जनरलों के कानों तक नहीं पहुंच रही हैं।
खार्तूम के रिहायशी इलाकों में मौत का तांडव
सूडान की सेना (SAF) और रैपिड सपोर्ट फोर्सेस (RSF) के बीच चल रही सत्ता की इस जंग में पिस तो आम जनता ही रही है। ताजा हवाई हमला उन इलाकों को निशाना बनाकर किया गया जहां लोग अपनी जान बचाने की कोशिश कर रहे थे। रिपोर्ट बताती है कि हमला इतना भीषण था कि इमारतों के परखच्चे उड़ गए। मलबे के नीचे दबे लोगों को निकालने के लिए न तो पर्याप्त संसाधन थे और न ही समय।
6 लोगों की मौत तो वो संख्या है जो आधिकारिक तौर पर सामने आई है। जमीनी हकीकत अक्सर इन सरकारी आंकड़ों से कहीं ज्यादा भयावह होती है। स्थानीय चश्मदीदों के मुताबिक, धमाके की आवाज कई किलोमीटर दूर तक सुनी गई। अफरा-तफरी का आलम ये था कि लोग घायल अवस्था में भी सुरक्षित ठिकानों की तलाश में भाग रहे थे। सूडान में अब कोई भी जगह सुरक्षित नहीं बची है। चाहे वो अस्पताल हों, स्कूल हों या रिहायशी सोसायटियां। हर जगह बारूद की गंध फैली है।
युद्ध के मैदान में बदलता सूडान
सूडान में छिड़ी यह जंग कोई दो दिन पुरानी बात नहीं है। अप्रैल 2023 से शुरू हुआ यह संघर्ष अब एक ऐसे मोड़ पर है जहां से वापसी का रास्ता धुंधला दिखाई देता है। जनरल अब्देल फतह अल-बुरहान और मोहम्मद हमदान डागालो (हेमेती) की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं ने पूरे देश को बंधक बना लिया है।
क्यों नहीं थम रही यह हिंसा
इसका सबसे बड़ा कारण जवाबदेही की कमी है। दोनों ही गुटों को लगता है कि वे सैन्य ताकत के दम पर सूडान पर कब्जा कर लेंगे। लेकिन असलियत में वे सिर्फ मलबे के ढेर पर राज करने की तैयारी कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय दबाव काम नहीं कर रहा क्योंकि पर्दे के पीछे कई क्षेत्रीय ताकतें अपने हितों के लिए इस आग में घी डालने का काम कर रही हैं। जब तक बाहरी मदद और हथियारों की सप्लाई नहीं रुकेगी, तब तक सूडान की गलियों में ऐसे हवाई हमले होते रहेंगे।
सूडान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा चुकी है। महंगाई आसमान छू रही है और खाने-पीने की चीजों की भारी किल्लत है। लोग भूख से मर रहे हैं या फिर गोलियों का शिकार हो रहे हैं। यह एक ऐसी मानवीय त्रासदी है जिसे दुनिया ने शायद भुला दिया है। यूक्रेन और गाजा की खबरों के बीच सूडान का दर्द कहीं दब कर रह गया है।
स्वास्थ्य सेवाओं का पूरी तरह ठप होना
सूडान में स्वास्थ्य व्यवस्था का हाल ये है कि घायल होने का मतलब अक्सर मौत ही होता है। खार्तूम और आसपास के इलाकों में 70% से ज्यादा अस्पताल काम करना बंद कर चुके हैं। जो थोड़े-बहुत चल रहे हैं, वहां न तो दवाइयां हैं और न ही बिजली। हालिया हवाई हमले के घायलों को जब अस्पताल ले जाया गया, तो वहां के डॉक्टरों के पास मरहम-पट्टी तक के पैसे नहीं थे।
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) ने बार-बार चेतावनी दी है कि सूडान में इलाज के अभाव में मरने वालों की संख्या युद्ध में मरने वालों से ज्यादा हो सकती है। हैजा और मलेरिया जैसी बीमारियां तेजी से फैल रही हैं। साफ पानी का मिलना एक लग्जरी बन गया है। ऐसे में हवाई हमले सिर्फ लोगों को मार नहीं रहे, बल्कि बचे हुए लोगों की जीने की उम्मीद को भी खत्म कर रहे हैं।
पलायन का बढ़ता बोझ और पड़ोसी देशों की चुनौती
सूडान से अब तक लाखों लोग पलायन कर चुके हैं। चाड, मिस्र और दक्षिण सूडान जैसे पड़ोसी देशों पर शरणार्थियों का भारी बोझ है। जो लोग देश नहीं छोड़ पा रहे, वे आंतरिक रूप से विस्थापित होकर शिविरों में रह रहे हैं। इन शिविरों की हालत किसी नरक से कम नहीं है।
हवाई हमलों के डर से लोग अब खुले आसमान के नीचे सोने को मजबूर हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि कंक्रीट की छत उनके लिए कब्र बन सकती है। यह डर जायज भी है। जब सरकार और विद्रोही गुटों के बीच की लकीर धुंधली हो जाती है, तो नागरिक सबसे आसान निशाना बन जाते हैं।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय की चुप्पी एक अपराध है
ईमानदारी से कहूं तो सूडान के मुद्दे पर वैश्विक शक्तियों का रवैया बेहद निराशाजनक रहा है। केवल बयानबाजी और चिंता जताने से जमीनी हकीकत नहीं बदलती। संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया जाता है। जब तक ठोस प्रतिबंध और सैन्य हस्तक्षेप की बात नहीं होगी, तब तक ये हवाई हमले नहीं रुकेंगे।
सूडान के लोगों को सहानुभूति नहीं, सुरक्षा चाहिए। उन्हें लंबे-चौड़े भाषण नहीं, बल्कि सिर पर एक सुरक्षित छत चाहिए। 6 मौतों की ये खबर कल पुरानी हो जाएगी, लेकिन जो परिवार उजड़ गए, उनकी भरपाई कभी नहीं हो पाएगी।
आपको क्या करना चाहिए
सूडान की स्थिति को केवल एक विदेशी खबर मानकर नजरअंदाज करना सबसे बड़ी गलती होगी। एक जागरूक वैश्विक नागरिक होने के नाते, आप इन तरीकों से प्रभाव डाल सकते हैं:
- सही जानकारी फैलाएं: सूडान के बारे में पढ़ते रहें और विश्वसनीय स्रोतों से जानकारी साझा करें ताकि यह मुद्दा मुख्यधारा की चर्चा से बाहर न हो।
- मानवीय सहायता: अंतरराष्ट्रीय रेड क्रॉस या डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (MSF) जैसे संगठनों को दान दें जो सीधे सूडान में काम कर रहे हैं।
- जागरूकता बढ़ाएं: सोशल मीडिया का इस्तेमाल सिर्फ मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि सूडान जैसे संकटों की आवाज उठाने के लिए करें।
सूडान की जंग कल खत्म नहीं होगी, लेकिन हमारी संवेदनशीलता वहां के लोगों को ये एहसास जरूर दिला सकती है कि वे इस लड़ाई में अकेले नहीं हैं। सूडान को इस वक्त शांति की सख्त जरूरत है, वरना 6 मौतों का ये आंकड़ा कब हजारों में बदल जाएगा, पता भी नहीं चलेगा।